उदासीनाचार्य जगद्गुरु भगवान श्री चंद का अवतरण दिवस प्रीतम भवन उदासीन आश्रम गोपाल नगर में श्रद्धा पूर्वक मनाया गया

PRATHM NEWS से रविंद्र किट्टी पंकज की रिपोर्ट 

जालंधर :: सं. 1551 वि. में उदासीनाचार्य जगद्गुरु श्रीचन्द्र भगवान का अवतरण युगपुरुष सद्गुगुरु नानकदेव के गृह में माता सुलक्षणा की कोख से सुलतानपुर (पंजाब) की पावन धरती पर हुआ। आप 11 वर्ष की आयु में विद्याध्ययन के लिए काश्मीर गये और पं. पुरुषोतम कौल से शिक्षा ग्रहण की। अल्पायु में ही आपने काशी के महान विद्वान् पं. सोमनाथ त्रिपाठी से शास्त्रार्थ किया और उसे परास्त कर उसका अभिमान भंग किया 24 वर्ष की आयु में आपने गुरुअविनाशी मुनि जी से दीक्षा प्राप्त कर देश-विदेश का भ्रमण आरम्भ किया। जीवन का अधिकांश समय आपका यात्राओं में ही बीता। आपकी यात्राओं का उद्देश्य जनमानस को धर्म के प्रति जागरूक करना था। तत्कालीन मुस्लिम शासकों को आपने राजधर्म का पाठ पढ़ाते हुए यह सन्देश दिया कि राजा का कर्तव्य प्रजा का हितचिन्तन करते हुए सबके साथ एक साव्यवहार करना होता है। अकबर से हारे हुए आत्मबल खो चुके महाराणा प्रताप को उपदेश दिया- “हे वीर प्रताप ! इस जीवन के संग्राम में न हर बार कोई जीता है न हर बार कोई हारा है, तुम तो अपना संघर्ष जारी रखो।” भामाशाह को महाराणा की आर्थिक सहायता के लिए प्रेरित किया। आपने अपनी पवित्र वाणी मात्रा वाणी के माध्यम से मानवमात्र को आपसी वादविवाद से दूर रहकर आपस में भ्रातृभाव बनाये रखने का सन्देश दिया। संपूर्ण जीवन पीड़ित मानवता को समर्पित कर 149 वर्ष की आयु में एक पत्थर पर खड़े होकर रावी नदी को अपने तपोबल से पार कर मणि महेश होते हुए कैलाशवासी अपने धाम कैलाश चले गये। इस पावन अवसर पर महामंडलेश्वर स्वामी शांतानंद जी ने आश्रम में पधारे हुए सभी संतों का अभिनंदन किया और श्रद्धा पूर्वक आई हुई संगत को बधाई दी इस अवसर पर धार्मिक दीवान सजाए गए और स्वामी जी ने अपने प्रवचनों से संगत को निहाल किया।

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